भुडूम-भड़ाम की आवाज़ के साथ, एकदम अर्ली मॉर्निंग में शुरू होई गवा घुसपैठ...
मन्नू भाई के बेडरूम से सटे बाथरूम के अन्दर। फिर अचानक एक सन्नाटा और तभी फ्लश बटन दबाते झर्र्र्र्र्र्र्र्र्र से बही गंगा मैया, बहा ले गयी सारे पाप।
बाहर आये मन्नू भाई। घुसपैठियों को सीमा से बाहर खदेड़ कर बड़ा ग्लैड फील कर रहे थे। दांत चमका के, साइड में डियो छपछपा के, चल दिए ऑफिस।
पहुँच भी गए भगवान् की कृपा से, बिना किसी की फटी में टांग अड़ाए। अन्दर घुसते ही ढेर सारी प्रोफेशनल स्माइल से हुआ आमना-सामना। सीना छलनी-छलनी हो जाए, इससे पहले भाग के पहुँच गए अपने बंकर के अन्दर। छुप के बईठ गए। काम-काज चालू। ठीक वैसे ही, जैसे कोलमोहन मउसा करते हैं अपने आफिस में ...एकदम चुपचाप।
कम्पूटर ऑन किये ही थे कि तभी बुलावा आ गया मीटिंग रूम से, जो उनके आने से 15 मिनट पहले से चल रही थी। फेस पर संकोच वाला एक्सप्रेशन लिए घुसे अन्दर मन्नू भाई।
चेयर खिसका के, मुंडी घुमा के, कुहनी टेबल पर टिका के ...सब अईसे देखे उनको जईसे शादी के मंडप से गायब दूल्हा अचानक वापिस आया हो। मन्नू भाई भी सबको इग्नोर मारते, उन्ही सब के लेवल का ऐंठ झारते ...बईठ गए साइलेंटली। जो बात चल रही थी, आगे शुरू हुई।
शुरू हुई तो ऐसा फील हुआ मन्नू भाई को कि जो बात चली आ रही थी उनके अन्दर आने से पहले, उससे उनका कुछ पुराना रिलेशन है। धप्प से सर पर हाथ रख के मन ही मन बुदबुदाए "अरे माँ कसम, ई तो हमारा ही प्रेजेंटेशन है।"
मन्नू भाई समझ चुके थे कि उनके काम को पडोसी ने अपना बना लिया है, उनके वर्क एरिया में घुसपैठ मचा दिया है।
तभी उनकी बुदबुदाहट टूटी, तालियों की गड़गड़ाहट से। मीटिंग हुई ख़तम। सब बाहर। मन्नू भाई तमतमाए पकड़ लिए पड़ोसी कलिग महोदय का कॉलर। झार दिए लेक्चर। कलिग महोदय भी पक्के घुसपैठिये, दांत दिखाए और चल दिए घर।
मन्नू भाई से रहा न गया। गुस्से में बैग उठाये पहुंचे घर।
श्रीमती जी ने भी कुछ न पूछा। वो भी समझ रही थी की मामला संगीन है। तभी पतिदेव के चेहरे पर कारगिल वाला सीन है।
चुपचाप चाय लेकर आई। उनके एंटरटेनमेंट के लिए न्यूज़ चैनल लगाई।
लेकिन सब बेकार। मन्नू भाई का मूड जस का तस। अब पत्नी भी ठहरी पत्नी। कब तक अपने पत्नी धर्म से दूर रह पाएगी?
पूछ ही पड़ी कि मामला क्या है?
मन्नू भाई भी भरे बईठे थे। भर-भरा के सब बाहर। अंत में बोल पड़े "बहुत गलत आदमी है वो, मेरे काम में घुसपैठ मचाया है"
उनकी श्रीमती हंस पड़ी "गलत वो नहीं, आप हैं। आप ही ने तो उसे सिर पर बिठाया है"
तभी उनकी बुदबुदाहट टूटी, तालियों की गड़गड़ाहट से। मीटिंग हुई ख़तम। सब बाहर। मन्नू भाई तमतमाए पकड़ लिए पड़ोसी कलिग महोदय का कॉलर। झार दिए लेक्चर। कलिग महोदय भी पक्के घुसपैठिये, दांत दिखाए और चल दिए घर।
मन्नू भाई से रहा न गया। गुस्से में बैग उठाये पहुंचे घर।
श्रीमती जी ने भी कुछ न पूछा। वो भी समझ रही थी की मामला संगीन है। तभी पतिदेव के चेहरे पर कारगिल वाला सीन है।
चुपचाप चाय लेकर आई। उनके एंटरटेनमेंट के लिए न्यूज़ चैनल लगाई।
लेकिन सब बेकार। मन्नू भाई का मूड जस का तस। अब पत्नी भी ठहरी पत्नी। कब तक अपने पत्नी धर्म से दूर रह पाएगी?
पूछ ही पड़ी कि मामला क्या है?
मन्नू भाई भी भरे बईठे थे। भर-भरा के सब बाहर। अंत में बोल पड़े "बहुत गलत आदमी है वो, मेरे काम में घुसपैठ मचाया है"
उनकी श्रीमती हंस पड़ी "गलत वो नहीं, आप हैं। आप ही ने तो उसे सिर पर बिठाया है"
ये सुनते ही मन्नू भाई ने बात टालने की नीयत से ली एक झूठी डकार। उनका चेहरा हो गया जैसे भारत सरकार।