Thursday, 17 January 2013

घुसपैठ


भुडूम-भड़ाम की आवाज़ के साथ, एकदम अर्ली मॉर्निंग में शुरू होई गवा घुसपैठ...
मन्नू भाई के बेडरूम से सटे बाथरूम के अन्दर। फिर अचानक एक सन्नाटा और तभी फ्लश बटन दबाते झर्र्र्र्र्र्र्र्र्र से बही गंगा मैया, बहा ले गयी सारे पाप। 

बाहर आये मन्नू भाई। घुसपैठियों को सीमा से बाहर खदेड़ कर बड़ा ग्लैड फील कर रहे थे। दांत चमका के, साइड में डियो छपछपा के, चल दिए ऑफिस।

पहुँच भी गए भगवान् की कृपा से, बिना किसी की फटी में टांग अड़ाए। अन्दर घुसते ही ढेर सारी प्रोफेशनल स्माइल से हुआ आमना-सामना। सीना छलनी-छलनी हो जाए, इससे पहले भाग के पहुँच गए अपने बंकर के अन्दर। छुप के बईठ गए। काम-काज चालू। ठीक वैसे ही, जैसे कोलमोहन मउसा करते हैं अपने आफिस में ...एकदम चुपचाप।

कम्पूटर ऑन किये ही थे कि तभी  बुलावा आ गया मीटिंग रूम से, जो उनके आने से 15 मिनट पहले से चल रही थी। फेस पर संकोच वाला एक्सप्रेशन लिए घुसे अन्दर मन्नू भाई।

चेयर खिसका के, मुंडी घुमा के, कुहनी टेबल पर टिका के ...सब अईसे देखे उनको जईसे शादी के मंडप से गायब दूल्हा अचानक वापिस आया हो। मन्नू भाई भी सबको इग्नोर मारते, उन्ही सब के लेवल का ऐंठ झारते ...बईठ गए साइलेंटली। जो बात चल रही थी, आगे शुरू हुई।

शुरू हुई तो ऐसा फील हुआ मन्नू भाई को कि जो बात चली आ रही थी उनके अन्दर आने से पहले, उससे उनका कुछ पुराना रिलेशन है। धप्प से सर पर हाथ रख के मन ही मन बुदबुदाए "अरे माँ कसम, ई तो हमारा ही प्रेजेंटेशन है।"  
मन्नू भाई समझ चुके थे कि उनके काम को पडोसी ने अपना बना लिया है, उनके वर्क एरिया में घुसपैठ मचा दिया है।  

तभी उनकी बुदबुदाहट टूटी, तालियों की गड़गड़ाहट से। मीटिंग हुई ख़तम। सब बाहर। मन्नू भाई तमतमाए पकड़ लिए पड़ोसी कलिग महोदय का कॉलर। झार दिए लेक्चर। कलिग महोदय भी पक्के घुसपैठिये, दांत दिखाए और चल दिए घर।

मन्नू भाई से रहा न गया। गुस्से में बैग उठाये पहुंचे घर।

श्रीमती जी ने भी कुछ न पूछा। वो भी समझ रही थी की मामला संगीन है। तभी पतिदेव के चेहरे पर कारगिल वाला सीन है।

चुपचाप चाय लेकर आई। उनके एंटरटेनमेंट के लिए न्यूज़ चैनल लगाई।

लेकिन सब बेकार। मन्नू भाई का मूड जस का तस। अब पत्नी भी ठहरी पत्नी। कब तक अपने पत्नी धर्म से दूर रह पाएगी?
पूछ ही पड़ी कि मामला क्या है?

मन्नू भाई भी भरे बईठे थे। भर-भरा के सब बाहर। अंत में बोल पड़े "बहुत गलत आदमी है वो, मेरे काम में घुसपैठ मचाया है"
उनकी श्रीमती हंस पड़ी "गलत वो नहीं, आप हैं। आप ही ने तो उसे सिर पर बिठाया है"  

ये सुनते ही मन्नू भाई ने बात टालने की नीयत से ली एक झूठी डकार। उनका चेहरा हो गया जैसे भारत सरकार। 


Thursday, 6 September 2012

नाजायज़ प्यार



एकदम सुबह-सुबह, early morning  में...8 बजे खुद से लड़ते-झगड़ते उठे मन्नू भाई. उठते ही श्रीमती जी उनके हाथ में थमा दिया गरमागरम वीरता पुरस्कार. एक चुस्की मारते ही आँख खुली. आँख खुलने पहले ही खुला पड़ा था टीवी. चालू थी खबरों की 100 मीटर रेस...दिए दनादन. मतलब, अगर पलक  झपकी तो आप हुए रेस से बाहर. तभी एक ऐसी खबर ने मार ली बाज़ी, जिसे सुनते मन्नू भाई का कान सनसना गया...दिमाग झनझना गया...रोम-रोम टनटना गया. 

खबर ये थी कि "कहीं के, कौनो हस्पताल में 4 महीने  में  बच्चा पैदा हुआ, वो भी सिकुड़ा-पुकुडा नहीं...एकदम चकाचक". 15 सेकेंड में 17 बार rewind हो गयी ई खबर...अरे भईया, मन्नू भाई के दिमाग में नहीं, TV पे. 

 ई खबर का असर लिए निकले ऑफिस मन्नू भाई. आज थोडा लेट हो गए. पहुंचे. आफिस में भी एकदम पगलाहट मची थी खबर सुनके. आज तो सबको अपना theory लगाने का शानदार मौका मिला था. कैंटीन में संसद लग चुकी  थी. हंगामे के बीच बहस जारी थी. ज्ञान का distribution चालू था हर तरफ. 

कोई बोले कि इसमें चाइना का हाथ हो सकताहै. कोई कहे ई तो आदमी का बच्चा ही नहीं लगता है (चुटकी लेके कौनो बोल पड़ा...तो फिर ये किसी नेता का बच्चा होगा, जल्दबाजी में बिना किसी बहस के पास हो गया). ई सब चर्चा-वर्चा चले जा रही थी. लेकिन मन्नू भाई शांत बैठे मचल रहे थे. उथल-पुथल मची थी. 

शाम हुई. निकले घर. अगल-बगल...हर जुबान पर एक ही हलचल "ऐसे-कैसे?"  science भी थका-हारा बैठा था. सब मान चुके थे...ई तो ऊपर वाले का चमत्कार है. 

पहुंचे घर मन्नू भाई. पहुँचते लेटेस्ट अपडेट के लिए खोल दिए टीवी. खबर अभी भी rewind हुए जा रही थी. तभी प्रकट हुआ एक एंकर, जोरदार चिंघाड़ के साथ "सन्नाटे को चीरते हुए आया है एक सनसनाता बच्चा. आपको क्या लगता है...4 महीने में ही पैदा हुआ ये बच्चा भगवान् का चमत्कार है?" 

ई सब चले रहा था कि दुनिया को अईसे हैरान-परेशान देख एंकर के बगल में प्रकट हो गए भगवान्. मुंह लटकाए. गुस्सा दबाये. और बोल पड़े "एई  बबुआ लोग...हमको काहें दोष दे रहे हो. ई बच्चा हमरा कौनो चमत्कार वमत्कार नहीं, ई तो promotion और आरक्षण का नाजायज़ प्यार  है"

Thursday, 30 August 2012

नम्बर का खेला



सब नम्बर का है खेला.
कोई खेल रहा मिल-जुल के,
कोई खेल रहा अकेला
सब नम्बर का है खेला. 
इस नम्बर के लिए जाने कितनो ने
जगह-जगह धक्के खाए,
जाने कितनो ने है, किस-किस को धकेला.
सब नम्बर का है खेला. 


बचपन से ही बड़ों ने बताया
गाड़ी, लैपटॉप सब मिलेगा 
अगर तू ज्यादा नम्बर लाया.
बचपन की वही आदत,
आज तक असर दिखा रही है.
नम्बर बढ़वाने के चक्कर में,
जाने कितनों के दुम हिलवा रही है.
कोई कहीं बांटने में लगा है.
कोई किसी का काटने में लगा है.
कोई बिना बात, जोर-जोर डांटने में लगा है.
कोई पूरी की पूरी प्लेट चाटने में लगा है.
कोई बकर मचाये, घिरा है चारों ओर से.
कोई नॉन-स्टॉप, आगे-पीछे नाचने में लगा है.

कोई लाके चाय-पानी पिया रहा है.
कोई झूठ्ठो मुस्किया रहा है.
कोई अपने खर्चे पे जूनियर जिया रहा है.
कोई अल्ट्रा-अंग्रेजी बतिया रहा है.
कोई कर रहा तेल-मालिश.
कोई presentation के नाम पे,
सबको #@तिया बना रहा है.
मच रहा काम का शोर, हाय रे बिना किसी काम का. 
कोई ego maintenance के लिए खिसिया रहा है.


cubicles में घुसे पड़े.
एक-दूसरे के कंधे पर खड़े.
बेमतलब के point पर अड़े.
ऊपर से फिट, अन्दर से गले-सड़े.
यहाँ सब हैं गुरु, कोई ना चेला.
क्यूंकि ये है सब नम्बर का खेला. 


Wednesday, 21 March 2012

ये कैसा बजटपना है?


पसीने की टुप-टुप, हारन की पों-पों, भीड़ की झों-झों, ट्राफिक हवालदार की चिल्लाहट, हेडलाईट की बैकलाईट से टकराहट, जूप्प्प  करके
कहीं-किधर से निकल जाने की फड़फड़ाहट...किसी को चालान हो जाने की घबराहट. सड़क पर चल रहे इस प्रतियोगिता में, फंसे बैठे थे मन्नू भाई...मित्र की दुपहिया के पीछे.  full चिकचिक में, इकदम सन्नाटा साधे. 


तभी उनके सन्नाटे को चीरती एक सनसनी तो नहीं आई...लेकिन आई एक लाल बत्ती गाडी. चपक के खड़ी हुई बगल में. रास्ता बनाने के चक्कर में पोइं-पोइं सायरन बजाये जा रही थी, लाल बत्ती चमकाए जा रही थी. लेकिन भैया अबकी बार इस लाल बत्ती पर, पड़ी आम जनता की लाल बत्ती भारी. घुर्र-घुर्र करके होई गयी खड़ी.  

बगल में खड़ी हो लाल बत्ती और मन्नू भाई चुपिया जाएँ...ऐसे-कैसे? लगे ताकने. अरे ई का...ई तो मुख्खु मौसा बईठे हैं अन्दर. दुआ-सलाम करने के लिए किया ठक-ठक window पे. लेकिन no reply. मन्नू भाई समझ गए कि budget के बाद आम जनता को reply देना ठीक नहीं. इसलिए वित्त मंत्री के रूप में प्रधानमन्त्री बने बैठे हैं. यही सोचते खुल गयी बत्ती, आगे निकले.

अगली बत्ती पर फिर हुई मुलाक़ात. मौका मिले तो मन्नू भाई कहाँ मानने वाले. फिर किया ठक -ठक. अबकी बारी मौसा जी ने किया notice मन्नू भाई को.  अन्दर किया  invite. मन्नू भाई होई गए एकदम चौड़े. अरे भाई, आम आदमी का काम-तमाम करने वाले मौसा जी ने जो invite किया था. 

घुसे अन्दर confidence के साथ. लेकिन घुसते ही  एकदम conscious से हो गए. चुप्पे बैठ गए. अरे भाई जब छोटे-मोटे आफिस-वाफिस में "वित्त" वालों से नहीं बनती तो ये तो ठहरे उनके मंत्री...इनके बगल में तो अच्छे-अच्छे चित्त हो जाएँ. 

चुप्पी-चप्पी में किसी तरह निकला कुछ किलोमीटर.  ना वो बोलेन, ना ये. लेकिन ऐसा कब तक? ये सोच कर मन्नू भाई ने एक सांस में दिल की बात उड़ेल दी तडतड़ा  के "एई मौसा...अबकी  बार बजट कुछ समझ ना आया" 

मौसा ने मारी मुस्की और बिना कुछ बोले...बगल झोला से निकाल के दिया एक रसगुल्ला. मन्नू भाई ने बिना किसी चकर-पकर के लिया निगल. 
निगलते ही फिर पूछ पड़े "एई मौसा...बताओ.."

फिर बात काटते मुख्खु मौसा ने  offer किया मुट्ठी भर किशमिश. मन्नू भाई समझ गए कि ई तो सनके पड़े हैं. इसलिए silently गटक गए किशमिश...एक-एक करके. 

जैसे ख़त्म हुई किशमिश, मौसा ने किया इशारा और खाली सड़क पे लगा ब्रेक. मन्नू भाई पड़े बाहर (खड़े होने का मौका ही ना मिला) और मौसा के बॉडीगार्डों ने जमके दिखाया अपना पॉवर.  

कचरे हुए से मन्नू भाई झूलते पहुंचे घर. बदन पर सूजन कम, पर दिमाग में कनफूजन ज्यादा. 
दरवाजा खोलते श्रीमती जी सन्न. झटके से खींचा अन्दर, कोई देखने ना पाए. 

श्रीमती जी के पूछने से पहले ही मन्नू भाई ने फफक-फफक के सुनाया पूरा हाल और बोले, "अरे पहले मीठा-मीठा खिलाना, फिर जमके कचरवाना...ये कैसा बचपना है?"
श्रीमती जी बत्तीसी दिखाते...दिमागी कनफूजन भगाते बोल पड़ी, "ये  मौसा जी का बचपना नहीं, बजटपना है"

Tuesday, 13 March 2012

रेल की राजनीति

जैसे ही मन्नू भाई को टेलीफून पे मिली एक खबर...उतर गया होली का सारा लहर.  वापिस जाने की टिकट तो थी, लेकिन रीजर्वेशन कराते वक़्त  खराब performance की वजह से सीट हार चुके थे...लग गयी वेटिंग. 

बैकअप में मिली भी सीट तो...निचले दर्जे के डब्बे में. आँख की चमक...होई गयी 100 वाट से 10 वाट. मुँहा तो एकदम लटक के राहुल गाँधी हो गया.

अब मन्नू भाई अईसा मुंह लिए ट्रेन में जाते, तो जो सीट मिली भी थी...उस पर बैठ ना पाते. इसलिए अपने मुंह को चमकाए चल दिए station. धडाधड पहुंचे.  भड़ाभड घुसे. लेकिन तड़ातड अन्दर घुस नहीं पाए.  

अईसन भीड़ कि....जिधर मुंह घुमाए, चुम्मी मिल जाए. सब के सब अईसे चपके पड़े...मानो आज विश्वा चपकन-चपकाई दिवस हो. 72 के डब्बा में 270 (कमजोर दिल वाले कृपया ये डिटेल ना पढ़ें. पढेंगे तो कभी होली के आस-पास  ट्रेन में ना चढ़ेंगे).

माहौल में घुलते-मिलते, चपक के चलते...१२ मिनट में मन्नू भाई अपनी सीट पर. जो होकर भी नहीं थी. किसी और ने परचा दाखिला करके हथिया ली थी. मन्नू भाई ने डर छुपाते हुए आँखें चढ़ाई और जैसे ही अपना हक जताने की कोशिश की...तभी कोई गुर्राया "देखते का हो बे...सीटवा घर ले जाओगे का? अरे बैठ जाओ...आगे उतरना ही है हमे". 

गर्मी, और गरम ना हो जाए इसलिए मन्नू भाई ठन्डे बने रहे.  गठबंधन का आप्शन चुपचाप चुन लिया.  
कुछ square centimeter में घुसड़ के टिका दी अपनी square feet वाली तशरीफ़. थोड़ी तसल्ली मिली. 
अईसा गचाक feel हुआ, जईसे सीट हारने के बाद भी मंत्री पद की उम्मीद बची हो. वही उम्मीद लिए, बिना चिकचिक के टिक गए. 

जईसे-तईसे तशरीफ़ के एक छोटे से हिस्से की सीट के साथ अच्छे सम्बन्ध बने...कि तभी घच्च्च-पच्च करके एक झटके से ट्रेन रुक गयी. 
इधर सम्बन्ध में हिलावट आई और उधर गठबंधन वाली दूसरी पार्टी ने सोच-समझ कर, अनजान बनते हुए थोड़ी और सीट हथियाई.

फिर भी शांत बने रहे मन्नू भाई. वईसे भी इन लोगों को तो आगे उतरना ही है...ये सोच के standby mode में चले गए. 

आगे उतरना है का चक्कर 8 घंटे तक चला...तब जाकर रात २ बजे गठबंधन पार्टी ने पूरी सीट मन्नू भाई के हवाले की. और मन्नू भाई को अईसे आँख दबा के देखे जईसे सीट देके एहसान किया हो. 

मन्नू भाई ने भी इस एहसान तले लेट जाना ही बेहतर समझा...और mind करते हुए भी, don't mind वाला expression देकर,   सीट पे लम्बे हो लिए. 

इधर नींद हुई गहरी. उधर लगा ट्रेन का झटका. बड़े भोर में कहीं किसी station पे रुकी. मन्नू भाई हडबडा के उठे. चार लोग अगल-बगल चढ़े पड़े थे. चरमराती कमर को सहलाते हुए पूछ पड़े एक सज्जन से, "दिल्ली आ गयी क्या?"

वो सज्जन चेहरे पे असज्जन सी smile लिए बोले "दिल्ली अभी दूर है"

मन्नू भाई ने चुपचाप अपने मुंह पे चादर चढ़ाई और समझ गए कि उनका मुँहा अभी भी लटक के राहुल गाँधी बना पड़ा है. 

Wednesday, 2 November 2011

लक्ष्मी चली ससुराल



भिखारी, अधिकारी, व्यापारी, प्राइवेट, सरकारी, हर प्रकार के नर औउर नारी...अबकी दिवाली कर के रखे थे पूरी तैयारी मैया लक्ष्मी को पटाने का, तिजोरी में बिठाने का. काहें की भैया...बिना audition के लक्ष्मी को घर बुलाने का ई मौका भी साल में एक्के बार आता है (खानदानी खादी-धारियों को छोड़कर).

अब जब मौका आया है तो मन्नू भाई भी काहें रहें
पीछे, ऊ भी तैयार...चाईनीज़ झालर-वालर लेकर.  सोचे कि चमक जितनी...मैया जी के visit का chance उतना. उन्हें का मालूम कि मैया जी फिलम इंडस्ट्री से बिलकुल भी inspired नहीं हैं. जहां आजकल trailer का चमक दिखाई के बुलाई लेते  हैं और जो पहुँच गए उन्हें चूना मारके चमकाई देते हैं.

चमकने की तैयारी जोर-शोर से चालू. श्रीमती जी भी साथे-साथ लगी रही. दोपहर तक काम निपटा, निकले फुलझड़ी-पटाखा लेने. पहुंचे बाज़ार. झमक के सजा हुआ. लेकिन पटाखा दिखा कम. मन्नू भाई हैरान. स्टाल पे पहुंचे...धीरे से पूछे "मामला का है...एतना कम पटाखा?"

दुकान वाले बबुआ ने ध्यान ना दिया और ऐसे react किया जैसे कह रहा हो...लेना हो तो लो, नहीं तो खिसको. मन्नू भाई ना माने...फिर से वही सवाल. दुकानवाले बबुआ ने वूफर वाले म्यूजिक सिस्टम जैसा नाक फुला लिया, आँखें 42 इंच LCD जितना फैला लिया और जैसे लगा फटने को है...मन्नू भाई खिसक लिए.  


उनकी समझ ना आया कि उसकी कौन सी दुखती रग पर वो चढ़ गए थे. जैसे खिसके, एक भाई साब ने उनकी तड़प शांत की, बोले "अरे महंगाई से लड़ने के चक्कर में लोग इस बार pollution free दिवाली मना रहे हैं और इनका दिवाला खिसका रहे हैं...गुस्सा तो बनता है"

मन्नू भाई भी pollution free दिवाली मनाने का इरादा लिए वापिस घर. हो गयी शाम. स्विच ऑन करके फ़टाफ़ट जलाया झालर. ऐसा जला कि बगल वाले जल जाएँ. हर तरफ रौशनी ही रौशनी. मैया लक्ष्मी के इंतज़ार में घर के दरवाज़े खुले रहे. देर रात तक आई नहीं मैया तो लगे डिनर करने.

तभी छम-छम की आवाज़. दौड़ के आये बाहर मन्नू भाई. सामने थी काली-कलूटी लक्ष्मी मैया. सफेदपोश उल्लू पे बैठी. थोड़ी मुरझाई. देखते ही श्रीमती जी गिर पड़ी बेहोश होकर.


मन्नू भाई भी सन्न...सांस लटकी...आँखें अटकी. हिम्मत करके पूछ पड़े
"मैया...किसने ये तुम पर काला रंग डाला?"

माँ बोल पड़ी, "नीयत किसी और की काली, चेहरा हो गया मेरा काला." और कहते ही हो गयी ऐसे छूमंतर जैसे ससुराल से सासु  माँ ने जोर से आवाज़ लगाई हो.

इतने में आँख रगड़ते...डरते-डरते जागी श्रीमती जी. बिना दांत दिखाए धीरे से पूछा, "कहाँ गयी मैया? "


मन्नू भाई दिल में फंसे से...बाहर हँसे और बोले, "स्विस बैंक" 



Thursday, 13 October 2011

Adoption के लिए भौंकना जरूरी है?



फिर से एक सुबह हुई मन्नू भाई की ज़िन्दगी में...जैसे हर रोज़ होती है. उमड़ती रही अंगडाई, जब तक चाय ना आई. चुस्की अन्दर, फुर्ती बाहर.  सामने के घर के दूसरे फ्लोर पर देखा तो वो तैयार खड़ी थी नहा-धो के...
झाँक रही थी गलियारे से बाहर. ई  देखो...का सोचने लगे?  ओह्ह्ह...वो का मतलब हमेशा वो ही नहीं होता है...जो सोच के बड़ा मुस्किया रहे हैं. अरे यहाँ वो मतलब रिन्नी, उस फ्लोर वाले की female dog. female dog इसलिए, क्यूंकि कहीं  इसका हिंदी translation  रिन्नी के owner रमन बाबू ने सुन लिया तो अईसन जमके hurt हो जायेंगे, जेतना कि अपने पिताजी के नाम के आगे से "श्री" हटाने पे नहीं होते.

अरे भईया का बताएं, अईसे ठाठ से रखते हैं उसको...जईसे KBC में पहुँचने का कोई जुगाड़ हो उसके पास. रमन बाबू तो बुजुर्गी में शायद अपनी अम्मा को  एतना मोहब्बत से ना चूमे होंगे...जेतना lovingly रिन्नी को चूमते हैं. सब किस्मत का खेला है, यही सब सोचते चाय की चुस्की ले रहे थे कि तभी रिन्नी की भो-भो से मन्नू भाई को याद आया कि ऑफिस जाना है. नहाए-धोये फ़टाफ़ट. निकलने को हुए कि तभी मिल गए रमन बाबू, रिन्नी गोद में.

अब मिल गए तो मन्नू भाई कहाँ चूकने वाले, पूछ पड़े  "इसे लेकर कहाँ?" रमन बाबू ने भौहें ऊपर उठायी, गोल-गोल जीभ घुमाई और बोले "२ दिन पहले adopt किया है...अकेले घबराती है इसलिए इसे  friend के घर छोड़ देता हूँ" 
मन्नू भाई ने भी formality बरकरार रखते हुए कर दी तारीफ़,
"अच्छा है, वैसे रिन्नी है बड़ी beautiful"
इतना सुनते रमन बाबू ऐसे चौड़े हुए मानो किसी ने उन्हें परमवीर चक्र प्रदान कर दिया हो,  मन्नू भाई के प्रति उनके मन में आज और भी सम्मान जाग पड़ा. इतने प्रेम और विश्वास के साथ देखा मन्नू भाई को...मानो इनकी बेटी की शादी का सारा खर्चा इन्होने उठाने का वादा किया हो. मन्नू भाई का प्लान तो था full detail में जाने का लेकिन रमन बाबू की ऐसी unwanted सी feeling देखकर समझ गए...कि गलती से और तारीफ़ की तो हर रोज़ इन्ही के साथ ऑफिस जाना पड़ेगा. रिन्नी का ही गुणगान सुनना-सुनाना पड़ेगा. इसलिए चुप. एकदम.

आगे बढे दोनों. थोडा लेट थे आज. ऑटो कर लिया. रास्ता एक ही था इसलिए बैठ गए दोनों. माफ़ी, माफ़ी...दोनों नहीं, तीनो. आ गयी रेड लाइट. अब रिन्नी तो ठहरी रिन्नी...समझ रहे हैं ना!!! रेड लाइट पर उछल-कूद करके भाग गयी गोद से. रमन बाबू के होश गुल. इतने ट्रैफिक में कहाँ दौडाएं, कैसे पकडे. मची भागम-भाग. रिन्नी हसीना के पीछे बहा 100 ग्राम पसीना. थोड़ी देर बाद...वहीँ फूटपाथ के एक चितकबरे से चेहरे और कीचड भरी आँख वाले बच्चे के आई वो
हाथ . लेकर आया, थमाया.

रमन बाबू भावुक से हो पड़े...थोड़ी दरियादिली दिखाई और उसकी तरफ १० रुपये का नोट बढ़ाकर इंसानियत जताई.
बैठते ही ऑटो में बोल पड़े, "च च च...इन बच्चों के लिए लोग क्यूँ
कुछ करते नहीं हैं?
मन्नू भाई ऑटो रोका. उतरे. गुस्से से एक दर्द उठा, "क्यूंकि शायद, ये भौंकते नहीं हैं."